Friday, September 10, 2010

भूल गया हूँ...

इन तेज़ चलती गाड़ियों के बीच ,
दिखे सड़क के उस पार कि गलियां

भूल गया हूँ , इन अंधेरी गलियों में,
आँखों पर पट्टी बाँध आँख-मिचौनी खेलना।

अब आम बहुत मीठे मिले हैं,
पर भूल गया हूँ, उस आम के पेड़ पर चढ़,
खट्टे, अध-पके आमों को तोडना।

अब ज़िन्दगी चले हैं सीधी सड़कों पर,
भूल गया हूँ,उन छोटी-छोटी पग-डंडियों पर खो जाना।

अब जब भी पग नीचे जाएँ, चप्पल ही संभाले हैं,
भूल गया हूँ, नंगे पैर उस ठंडी माती पर चलना।

अब दूर-दूर तक सब दिखे हैं,
पर भूल गया हूँ, उस करीबी धुंधली परछाई को देखना ,
जो शायद मेरी ही थी ।

6 comments:

Wake Up !! FingerSnap, FingerSnap... said...

एक ही बात कहूँगी इस कविता के बारें में, चाहें यह अधूरी है पर फिर इसका तात्पर्य अपने आप समझ आता है. . . मुझे कविता का टोपिक पसंद आया. ऐसे ही लिखते रहना. भगवान् सदा आपको खुश रखें!

kshatriya harish singh said...

dhanyawaad

ajay singh said...

bilkul theek sachchai jhalakti hai

kshatriya harish singh said...

Shukriya Ajay!

Sambit Kumar Pradhan said...

Beautifully written. Loved the instances. :)

kshatriya harish singh said...

thanks Sambit

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