Wednesday, March 6, 2013

गलत मोड


जाना था जंगपुरा,
पर गलत मोड ही था,
जो मुझे निज़ामुद्दीन के किसी कोने में छोड़ गयी,
वो बस!

थी वो हरी बस,
पर सपने रंग बिरंगे लिए,
मैं चल पड़ा जंगपुरा की ओर।

इतनी ठंडी हवा,
की जेबों से हाथ ही न निकले,
सिकुड़कर चलता रहा,
वो गलत मोड ही था,
जो मैं चल रहा था।

गाडियाँ इतनी तेज़,
की पालक झपकते ही सब गायब,
देखा मैंने की मैं ही हूँ,
जो चल रहा था।
गलत मोड जो ले लिया था।

पर चलते चलते मैंने वो सब देखा,
जो मैं कभी गाड़ी में सूंघ भी न पाता।

मेरी बंद कविताओं के वो सुलझते खुलासे,
मेरी कहानियों के वो अंजाने अंत,
मेरे उन बेसुरे गानों के वो सुंदर सुर,
सब साफ दिखने लगा मुझे।
वो सब जो मैं कभी गाड़ी से सूंघ भी न पाता।

मैं जो चला तो मुझे आया ये समझ,
की सही ही कहा था उस महान कवि ने,
की मोड़ कभी गलत नहीं होते,
बस इंसान गलत होते हैं।
बस इंसान गलत होते हैं।
बस इंसान गलत होते हैं।

No comments:

WHY DID I GROW UP?

As a little kid, sitting right next to the tape-recorder, while listening to the song, I would look at the cassette cover, and wonder tha...